Saturday, 1 January 2022

कम्यूनिकेशन पर कुछ बातें कहनी हैं...

मुझे कम्यूनिकेशन के बारे में कुछ ज़्यादा अता-पता न था...मुझे यह भी न पता था कि यह एक अलग सब्जेक्ट भी होता है ...यह पता चला मुझे १९९२ में- आज से ३० साल पहले --जब मेरा मुंबई के टाटा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल साईंसेज़ में एक साल के डिप्लोमा इन हास्पीटल एडमिनिस्टे्शन में एडमिशन हो गया...

रोज़ाना शाम को चार घंटे की क्लासेस लगती थीं ..जो सब्जैक्ट हमें पढ़ाए गए उन में एक सब्जेक्ट यह भी था ...कम्यूनिकेशन। पूरा एक साल इस विषय को पढ़ कर जैसे आंखें खुल गईं...कोर्स तो हो गया लेकिन यह सब्जेक्ट जैसे मेरे दिलो-दिमाग पर छा सा गया...एक तो टीआईएसएस की पढ़ाई ...और ऊपर से यह सब्जेक्ट बड़ा रोचक था...सब कुछ धीरे धीरे समझ में आता गया...

कम्यूनिकेशन के बारे में खुद भी पढ़ता गया ...और बहुत से कोर्स भी करता गया...यहां तक की खेल खेल में मॉस कम्यूनिकेशन में पोस्ट-ग्रेजुएशन भी कर डाली ....

हर तरह की कम्यूनिकेशन की स्टडी की ...एक हॉबी जैसे बन गई....कम्यूनिकेशन के हर माध्यम को नज़दीक से देखा ...देखते ही देखते इन तीस सालों में कम्यूनिकेशन के बारे में इतना कुछ पल्ले पड़ गया कि सोचने लगा कि इसे कहां सहेज लूं ....बस, उसी क्रम में यह ब्लॉग बनाने का ख्याल आया ...

इंगलिश में मैं नहीं लिखना चाहता था ...क्योंकि इंगलिश में मैं उस तरह से एक्सप्रैस नहीं कर पाता हूं जैसा मैं पंजाबी में कर पाता हूं ..लेकिन पंजाबी बोलने-सुनने-पढ़ने से लोग परहेज करते हैंं, ऐसा मैंने महसूस किया है ...इसलिए सोचा जो भी बातें कहनी हैं हिंदी भाषा में ही कह लूंगा...

अब ब्लॉग का नाम सोचने में ही कितना अरसा बीत गया...बातें कम्यूनिकेशन की करनी हैं तो उस का टाइटल भी तो कुछ वैसा ही होना चाहिए...और ये जो सीधी सपाट ट्रासलेशन है न, यह मुझे टर्न-ऑफ कर देती है ...कम्यूनिकेशन का मतलब संवाद ....क्या मैं इसे अपने ब्लाग का टाइटल रख लूं। नहीं, नहीं....यह अपने आप ही मे संवाद इतना नीरस सा शब्द लगता है....

फिर मैंने सोचा कि शीर्षक कुछ ऐसा रख लेता हूं ....अल्फ़ाज़- कहे, सुने, पढ़े, लिखे ....या कहे, सुने, लिखे, पढ़े -- अल्फ़ाज़ ...पर कुछ मज़ा सा नहीं आया ...फिर सोचा कि वही ठीक है अंदाज़-ए-बयां .....कि बंदा अपनी बात रखता कैसे है...इस के बारे में बातें करनी हैं...

मुझे यह भी लगता है कि हर वक्त बंदे को अपने आप को अंडर-एस्टीमेट भी नहीं करना चाहिए...दूसरे लोग कुछ कहें या न कहें...लेकिन हर बंदे को अपनी स्ट्रैंथ-वीकनेस का तो पता ही होता है ...बस, उसी हिसाब से मुझे भी यह लगता है कि कम्यूनिकेशन के बारे में हर स्तर पर मैं इतना कुछ देख चुका हूं, पढ़ चुका हूं, ब्लॉग लिख चुका हूं ....और बहुत ही नज़दीक से आब्ज़र्व भी कर चुका हूं कि मुझे विषय पर अपने मन की बातें कागज़ पर उकेर देनी चाहिएं...

कहने को बहुत कुछ है ....बहुत कुछ ....इसलिए लिखने बैठ गया हूं ....आज २०२२ का पहला दिन है ...हिंदी, पंजाबी, उर्दू, इंगलिश के विद्वानों को जितना भी पढ़ चुका हूं उस की बिना पर यही कह सकता हूं कि कम्यूनिकेशन ही सब कुछ है ....जो हम कह देते हैं, जो नहीं भी कह देते लेकिन आंखें कह देती हैं, जो कह कर पछताते हैं, जो न कह पाने का मलाल ज़िंदगी भर सालता रहता है ....किसी के बातों के नश्तर जो ताउम्र चुभते हैं, किसी के मीठे बोल जो हमें बहुत अच्छा फील करवाते रहते हैं .....सब कुछ चक्कर अल्फ़ाज़ का ही है ...और कुछ नहीं ....

और अल्फ़ाज़ ही नहीं, अंदाज़-ए-बयां की भी बहुत अहमियत है .....बचपन से एक पंजाबी की कहावत सुनते आए हैं कि बंदे की ज़ुबान ही ए जेहड़ी उस नूं जुत्तियां भी पवा सकदी ए तो उस नूं ताज भी पहना सकदी ए...सच बात है आदमी की ज़ुबान ही है जो उस को जूते पड़वा सकती है और तख्त-ओ-ताज़ भी दिला सकती है ....


1 comment:

  1. आप भी छुपे रुस्तम हो. TISS से डिप्लोमा भी किया है. मान गए उस्ताद.

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